Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko

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Hindi inspirational poem by Maithili Sharan Gupt

Lyrics in Hindi, English, Sanskrit, with a line-by-line English and Hindi translation.

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नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो

Nar ho, na nirash karo man ko Kuchh kaam karo, kuchh kaam karo

नर् हो, न निराश् करो मन् को कुछ् काम् करो, कुछ् काम् करो

Be a man — do not let your heart sink into despair. Do something with your life; take some action. The poem opens with its refrain, a call away from self-pity and toward effort.

कवि मनुष्य को सम्बोधित करके कहता है कि तुम "नर" हो — सृष्टि का सबसे समर्थ प्राणी — इसलिए मन को हताशा में मत डूबने दो। निराशा मनुष्य होने के गौरव के विरुद्ध है। बार-बार दोहराया गया आग्रह "कुछ काम करो" ही पूरी कविता की धुरी है — बैठकर सोचते रहने के बजाय उठो और कर्म करो।

जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो

Jag mein rah kar kuchh naam karo Yah janm hua kis arth aho

जग् में रह् कर् कुछ् नाम् करो यह् जन्म् हुआ किस् अर्थ् अहो

While you live in this world, make some name for yourself. Ask yourself — for what purpose was this birth even given? The wonder of having been born at all demands an answer from you.

इस संसार में जन्म लिया है तो कुछ ऐसा करो जिससे तुम्हारा नाम बने, तुम्हारी कोई पहचान बने। "अहो" विस्मय और पुकार का शब्द है — कवि चौंककर पूछता है कि आख़िर यह मनुष्य-जन्म किस प्रयोजन के लिए हुआ है? यह प्रश्न उलाहना नहीं, जगाने वाली टेर है कि अपने जीवन का अर्थ पहचानो।

समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को

Samjho jismen yah vyarth na ho Kuchh to upyukt karo tan ko

सम्झो जिस्में यह् व्यर्थ् न हो कुछ् तो उपयुक्त् करो तन् को

Consider carefully, so that this life does not go to waste. Put this body of yours to some fitting use, some work worthy of it.

जीवन का जो भी अर्थ हो, उसे समझो और ऐसा जियो कि यह जन्म व्यर्थ न चला जाए। शरीर मिला है तो उसे किसी सार्थक काम में लगाओ — वह निरा भार बनकर न रह जाए। "उपयुक्त करो तन को" का भाव है कि देह को उपयोग में लाओ, उसे सिर्फ़ भोगने की वस्तु मत बनाओ।

नर हो, न निराश करो मन को सँभलो कि सुयोग न जाए चला

Nar ho, na nirash karo man ko Sambhalo ki suyog na jaaye chala

नर् हो, न निराश् करो मन् को सम्भलो कि सुयोग् न जाए चला

Be a man — do not let your heart sink into despair. Gather yourself and stay alert, lest the good moment pass you by and the opportunity slip away.

मनुष्य होने का स्मरण दिलाते हुए कवि फिर सावधान करता है — सँभल जाओ, कहीं अच्छा अवसर हाथ से निकल न जाए। "सुयोग" वह अनुकूल घड़ी है जो सबको बार-बार नहीं मिलती। आलस्य या दुविधा में समय बीत गया तो पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना

Kab vyarth hua sadupaay bhala Samjho jag ko na nira sapna

कब् व्यर्थ् हुआ सदुपाय् भला सम्झो जग् को न निरा सप्ना

When has an honest, well-made effort ever gone to waste? Never. And do not take this world to be a mere dream, an unreal thing not worth acting in.

कवि पूछता है — भला कब ऐसा हुआ है कि सही दिशा में किया गया प्रयत्न बेकार गया हो? "सदुपाय" यानी उचित साधन और सच्चा उद्यम कभी निष्फल नहीं होता। और इस संसार को केवल एक झूठा सपना मानकर मत छोड़ दो; यह जगत मिथ्या नहीं, कर्म करने का वास्तविक क्षेत्र है।

पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलंबन को

Path aap prashast karo apna Akhileshwar hai avalamban ko

पथ् आप् प्रशस्त् करो अप्ना अखिलेश्वर् है अवलम्बन् को

Lay out your own road before you and make it broad and clear. And know that Akhileshwar — the Lord of all that exists — stands there as your support to lean on.

अपना मार्ग तुम स्वयं चौड़ा और प्रशस्त बनाओ — कोई दूसरा आकर तुम्हारे लिए रास्ता नहीं बनाएगा। और सहारे की चिंता मत करो, क्योंकि "अखिलेश्वर" यानी समस्त सृष्टि का स्वामी ईश्वर तुम्हारे अवलंबन के लिए खड़ा है। पुरुषार्थ तुम्हारा, और उसे थामने वाला हाथ परमात्मा का — यही संतुलन कवि सामने रखता है।

नर हो, न निराश करो मन को जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ

Nar ho, na nirash karo man ko Jab praapt tumhen sab tattva yahan

नर् हो, न निराश् करो मन् को जब् प्राप्त् तुम्हें सब् तत्त्व् यहां

Be a man — do not let your heart sink into despair. When every essential element you need has already been granted to you here in this life —

मनुष्य को फिर पुकारकर कवि कहता है कि निराश होने का कोई कारण ही नहीं है। जीवन जीने और आगे बढ़ने के लिए जितने भी "तत्त्व" — साधन, शक्तियाँ, सामग्री — चाहिए, वे सब तुम्हें यहीं इसी संसार में उपलब्ध हैं। कमी बाहर नहीं, केवल उन्हें पहचानने और बरतने में है।

फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो

Phir ja sakta vah sattva kahan Tum svattva sudha ras paan karo

फिर् जा सक्ता वह् सत्त्व् कहां तुम् स्वत्त्व् सुधा रस् पान् करो

— then where could that essence possibly go? It cannot leave you. So drink the nectar of your own true selfhood, the sweetness of what is genuinely yours.

जब सब कुछ तुम्हारे पास है, तो वह "सत्त्व" — तुम्हारा बल, सार और सामर्थ्य — भला कहाँ चला जाएगा? वह तुम्हारे भीतर ही है, बस उसे पहचानो। "स्वत्त्व सुधा रस" अर्थात् अपने निजत्व का, अपने भीतर छिपे अमृत का पान करो — आत्मगौरव के उस रस को चखो जो तुम्हें ही मिला है।

उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को

Uthke amaratva vidhaan karo Davroop raho bhav kaanan ko

उठ्के अमरत्व् विधान् करो दवरूप् रहो भव् कानन् को

Rise up and enact your own immortality — make deathlessness your law. Be like the wildfire that burns through the forest: the tangled woods of worldly existence are the forest, and you the flame that clears them.

उठो और अपने लिए अमरत्व का विधान रचो — ऐसा कर्म करो जिससे तुम मृत्यु के बाद भी जीवित रहो। "भव कानन" यानी यह संसार रूपी घना जंगल, और "दवरूप" यानी दावानल — वन में लगने वाली प्रचंड आग। कवि कहता है, इस संसार-वन के लिए तुम वही धधकती आग बन जाओ, जो जड़ता और बाधाओं को जलाकर राख कर दे।

नर हो न निराश करो मन को निज गौरव का नित ज्ञान रहे

Nar ho na nirash karo man ko Nij gaurav ka nit gyaan rahe

नर् हो न निराश् करो मन् को निज् गौरव् का नित् ग्यान् रहे

Be a man — do not let your heart sink into despair. Let the awareness of your own inherent dignity stay with you always, never forgotten.

मनुष्य को उसकी गरिमा याद दिलाते हुए कवि कहता है कि निराशा को मन में जगह मत दो। अपने गौरव का ज्ञान नित्य बना रहे — तुम कौन हो, तुम्हारी सामर्थ्य क्या है, यह कभी विस्मृत न हो। आत्मविस्मृति ही सबसे बड़ी हार है।

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे मरणोत्तैर गुंजित गान रहे

Ham bhi kuchh hain yah dhyaan rahe Maranottar gunjit gaan rahe

हम् भी कुछ् हैं यह् ध्यान् रहे मरणोत्तैर् गुंजित् गान् रहे

"We too amount to something" — hold that thought steadily. Let your song go on echoing even after death has taken you, so that what you sang outlives you.

"हम भी कुछ हैं" — यह छोटा-सा वाक्य आत्मसम्मान का बीज-मंत्र है; यह भाव कभी न मिटे। कवि चाहता है कि मृत्यु के बाद भी तुम्हारा यश गीत बनकर गूँजता रहे, लोग तुम्हारा नाम गाते रहें। जीवन इतना सार्थक हो कि वह अपने पीछे एक गूँज छोड़ जाए।

सब जाए अभी पर मान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को

Sab jaaye abhi par maan rahe Kuchh ho na tajo nij saadhan ko

सब् जाए अभी पर् मान् रहे कुछ् हो न तजो निज् साधन् को

Let everything else be lost right now, so long as honor remains standing. Whatever else happens, never abandon the means and capacities that are your own.

चाहे सब कुछ चला जाए, पर मान और स्वाभिमान बचा रहना चाहिए — सम्पत्ति से बड़ी पूँजी यही है। और कुछ भी हो जाए, अपने साधनों को, अपने प्रयत्न के औज़ारों को मत छोड़ो। हार तब होती है जब आदमी कोशिश करना ही छोड़ देता है।

नर हो, न निराश करो मन को प्रभु ने तुमको दान किए

Nar ho, na nirash karo man ko Prabhu ne tumko daan kiye

नर् हो, न निराश् करो मन् को प्रभु ने तुम्को दान् किये

Be a man — do not let your heart sink into despair. The Lord has already made you gifts, freely given.

फिर वही पुकार — हे मनुष्य, मन को निराश मत करो। प्रभु ने तुम्हें बहुत कुछ दान में दिया है; तुम खाली हाथ नहीं भेजे गए। जो कुछ ���ाहिए था, वह देकर ही तुम्हें इस संसार में उतारा गया है।

सब वांछित वस्तु विधान किए तुम प्राप्तस करो उनको न अहो

Sab vaanchhit vastu vidhaan kiye Tum praapt karo unko na aho

सब् वांछित् वस्तु विधान् किये तुम् प्राप्तस् करो उन्को न अहो

He has made provision for every thing a person could want. And yet — alas — you do not reach out and take hold of them.

जीवन के लिए जितनी भी वांछित वस्तुएँ चाहिए थीं, ईश्वर ने उन सबका प्रबंध पहले से कर रखा है — सामग्री कहीं कम नहीं। पर आश्चर्य है कि तुम स्वयं आगे बढ़कर उन्हें ग्रहण नहीं करते। "अहो" में कवि का खेदमिश्रित विस्मय है — देने वाला दे चुका, लेने वाला हाथ नहीं बढ़ाता।

फिर है यह किसका दोष कहो समझो न अलभ्य किसी धन को

Phir hai yah kiska dosh kaho Samjho na alabhya kisi dhan ko

फिर् है यह् किस्का दोष् कहो सम्झो न अलभ्य् किसी धन् को

So tell me, whose fault is this really? Do not decide in advance that some wealth or attainment lies beyond your reach.

जब सब कुछ सामने रखा हो और तुम उसे उठाओ ही नहीं, तो बताओ यह किसका दोष है? न भाग्य को दोष दिया जा सकता है, न ईश्वर को — कमी तुम्हारे अपने उद्यम में है। और यह मान लो कि कोई भी धन, कोई भी उपलब्धि तुम्हारे लिए अप्राप्य नहीं है।

नर हो, न निराश करो मन को किस गौरव के तुम योग्य नहीं

Nar ho, na nirash karo man ko Kis gaurav ke tum yogya nahin

नर् हो, न निराश् करो मन् को किस् गौरव् के तुम् योग्य् नहीं

Be a man — do not let your heart sink into despair. What honor is there that you are not fit to receive?

कवि प्रश्न के रूप में उत्तर देता है — भला ऐसा कौन-सा गौरव है जिसके तुम योग्य नहीं हो? मनुष्य की पात्रता पर कोई सीमा नहीं लगाई गई। जो भी ऊँचाई तुम्हें दिखती है, वह तुम्हारे लिए ही बनी है।

कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं जान हो तुम भी जगदीश्वर के

Kab kaun tumhen sukh bhogya nahin Jaan ho tum bhi jagdishwar ke

कब् कौन् तुम्हें सुख् भोग्य् नहीं जान् हो तुम् भी जगदीश्वर् के

When was any happiness ever declared off-limits to you? Understand that you too belong to Jagadishwar, the Lord of the universe.

कब, किस समय तुम्हारे लिए कोई सुख भोगना वर्जित रहा है? ऐसी कोई रोक नहीं लगी। और सबसे बड़ी बात — तुम भी "जगदीश्वर", यानी सारे जगत के स्वामी ईश्वर के अपने जन हो, उन्हीं की संतान हो।

सब है जिसके अपने घर के फिर दुर्लभ क्या उसके जन को

Sab hai jiske apne ghar ke Phir durlabh kya uske jan ko

सब् है जिस्के अप्ने घर् के फिर् दुर्लभ् क्या उस्के जन् को

Everything there is belongs to His own household. So what could possibly be out of reach for one who is His?

जिस स्वामी का सारा संसार अपना घर है, जिसके भंडार में सब कुछ मौजूद है — उसी के तुम अपने हो। तो फिर उसके अपने व्यक्ति के लिए दुर्लभ क्या रह जाता है? पिता का सब कुछ पुत्र का ही है, इस विश्वास में निराशा का कोई स्थान नहीं।

नर हो, न निराश करो मन को करके विधि वाद न खेद करो

Nar ho, na nirash karo man ko Karke vidhi vaad na khed karo

नर् हो, न निराश् करो मन् को कर्के विधि वाद् न खेद् करो

Be a man — do not let your heart sink into despair. Do not sit grieving while you argue about fate and what destiny has decreed.

"विधि" यानी विधाता, भाग्य या नियति। कवि कहता है — भाग्य को कोसते हुए और "सब कुछ पहले से लिखा है" की बहस करते हुए दुखी मत होते रहो। भाग्य पर वाद-विवाद निष्फल है; वह आदमी को बैठाए रखने का बहाना भर बन जाता है।

निज लक्ष्य निरंतर भेद करो बनता बस उद्‌यम ही विधि है

Nij lakshya nirantar bhed karo Banta bas udyam hi vidhi hai

निज् लक्ष्य् निरन्तर् भेद् करो बन्ता बस् उद्यम् ही विधि है

Keep striking at your chosen target, again and again, without pause. Effort itself is what becomes your destiny — exertion is the only fate there is.

अपने लक्ष्य पर लगातार निशाना साधो, बिना रुके उसे भेदते चलो। और असली बात यह है कि "विधि" — भाग्य — कहीं बाहर लिखा हुआ नहीं है; परिश्रम ही अपना भाग्य स्वयं गढ़ता है। जो उद्यम करता है, वह अपनी नियति का लेखक बन जाता है।

मिलती जिससे सुख की निधि है समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को

Milti jisse sukh ki nidhi hai Samjho dhik nishkriya jeevan ko

मिल्ती जिस्से सुख् की निधि है सम्झो धिक् निष्क्रिय् जीवन् को

It is from that effort that the treasure of happiness is obtained. Know, then, that a life spent in inaction is a life deserving only of shame.

उसी उद्यम से सुख का खज़ाना हाथ लगता है — सुख भीख में नहीं, श्रम से मिलता है। और जो जीवन निष्क्रिय है, कर्महीन है, उसे धिक्कार है। "धिक्" शब्द में कवि की तीखी फटकार है — बिना कर्म के बीता जीवन जीवन कहलाने योग्य ही नहीं।

नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो

Nar ho, na nirash karo man ko Kuchh kaam karo, kuchh kaam karo

नर् हो, न निराश् करो मन् को कुछ् काम् करो, कुछ् काम् करो

Be a man — do not let your heart sink into despair. Do something with your life; take some action.

अंत में कवि उसी टेर पर लौटता है — हे मनुष्य, मन को निराश मत करो। पूरी कविता का सार इन्हीं शब्दों में सिमट आता है। उठो, कुछ करो, कुछ करो — कर्म ही निराशा का एकमात्र उत्तर है।